कामाख्या देवी मंदिर: रहस्य और महत्व
अगर आपको भी मेरी तरह रहस्यमयी कहानियाँ सुनना और उनके पीछे की सच्चाई जानने की इच्छा रहती है, तो आज हम आपके लिए एक ऐसी ही रहस्यमयी कहानी लेकर आए हैं, जो पूरी तरह से सत्य पर आधारित है। आपने कामाख्या देवी मंदिर के बारे में सुना या पढ़ा जरूर होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस भव्य मंदिर के पीछे क्या रहस्य छुपा है? यदि नहीं, तो आइए जानते हैं असम के गुवाहाटी में स्थित कामाख्या देवी मंदिर के पीछे की कहानी।
कामाख्या देवी मंदिर गुवाहाटी से लगभग 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पहाड़ी पर स्थित है और यह असम के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर विशेष रूप से तंत्र क्रियाओं और देवी के योनि रूप की पूजा के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह मंदिर शक्ति की देवी सती से जुड़ा है और यह तांत्रिकों का प्रमुख सिद्धपीठ भी है। मां कामाख्या का यह सिद्ध शक्तिपीठ सती के 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, नीलांचल पर्वत पर माता सती की योनि गिर गई थी, और इसके आधार पर यह मंदिर कामाख्या देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। ऐसी मान्यता है कि माता की योनि नीचे गिरकर एक विग्रह में बदल गई, जो आज भी मंदिर में विराजमान है। इसी कारण यहां देवी सती की योनी की पूजा होती है। मंदिर का कपाट हर महीने तीन दिन के लिए बंद रहता है। इन तीन दिनों के दौरान देवी सती के मासिक धर्म के चलते मंदिर में सफेद कपड़ा रखा जाता है, जो बाद में लाल हो जाता है और भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है।
साल में 22 से 26 जून तक यहां अंबुवाची मेला आयोजित होता है, जिसे मां कामाख्या के मासिक धर्म चक्र और उनकी दिव्य स्त्री शक्ति के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर तीन दिनों के लिए बंद रहता है और पुरुषों के प्रवेश पर रोक होती है। माना जाता है कि इस समय मां कामाख्या रक्तस्राव करती हैं।
मां कामाख्या देवी को हर इच्छा पूरी करने वाली देवी के रूप में भी जाना जाता है। भक्त उनकी पूजा और तपस्या से खुश होने पर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण कराते हैं। संतान प्राप्ति के लिए भी लोग यहां आते हैं। इसके अलावा, कामाख्या मंदिर में नित्य पूजा का हिस्सा पशु बलि भी है, जिसमें मंदिर खुलने से पहले हर दिन देवी के लिए बलि दी जाती है।
अंबुवाची पर्व का रहस्य
अंबुवाची पर्व प्रत्येक वर्ष जून (आषाढ़) में मनाया जाता है। यह पर्व देवी सती के रजस्वला होने का प्रतीक है और विश्वभर के तांत्रिकों, साधकों और सिद्ध पुरुषों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस तीन दिवसीय पर्व के दौरान कामाख्या मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और पुरुषों का प्रवेश निषिद्ध होता है।
कामाख्या मंदिर में योनि पूजा का महत्त्व
कामाख्या मंदिर में योनि की पूजा देवी सती और भगवान शिव की कथा से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था, लेकिन उनके पिता इस विवाह से प्रसन्न नहीं थे। दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया और उसमें सती और शिव को आमंत्रित नहीं किया। सती जब यज्ञ में पहुंचीं और अपने पिता से कारण पूछा, तो उन्हें अपमानित किया गया। अपने पति का अपमान सहन न कर पाने पर सती ने यज्ञ की ज्वाला में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
भगवान शिव को यह घटना पता चलने पर उन्होंने तांडव किया, जिससे पृथ्वी असंतुलित हो गई। भगवान विष्णु ने शिव के क्रोध को शांत करने और सती के प्रति उनके मोह को भंग करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे, जिन्हें आज 51 शक्तिपीठों के रूप में जाना जाता है। कामाख्या देवी मंदिर उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है, जहां माता सती की योनि गिरी थी।
नीलाचल पहाड़ी में गिरी योनि ने देवी का रूप धारण किया, जिसे कामाख्या देवी कहा जाता है। योनि को जीवन और सृष्टि का प्रतीक माना जाता है क्योंकि बच्चे का पालन-पोषण और जन्म यहीं से होता है। इसी कारण भक्त यहां देवी सती की गिरी हुई योनि (गर्भ) की पूजा करने आते हैं, जो शक्ति, सृजन और समृद्धि का प्रतीक है।

